ब्रजेश जी की फाडू़ कविता.......
कभी-कभी बउराओ यार !
कभी-कभी पगलाओ यार !
चादर तान सुते मुद्दों को ढेला मार जगाओ यार.....
कभी-कभी बउराओ यार ! कभी-कभी पगलाओ यार !
अनगढ़-अटपट-अगड़म-बगड़म-गड़बड़-सड़बड़ गप्प-गुबार
झिझक जनेऊ तोड़ खडे़ हो, हन-हन घनो कि कसै लुहार
शोर बढ़ा है, चौंध बढ़ी है, हाड़ा दल-सी खबरें
गूँगे-बहरे सरजी, किसका-किसका पियाज कतरें
प्रिय-परिकल्पित-अभीष्ट-वांछित, कुछ दिन सब परहेजो
’क’ वर्णी संज्ञाओं को लुइहाओ लानत भेजो
फ़िफ़्थ फ़्लोर की खिड़की से कुछ ताको और खजुआओ
तेज करो थूथुन की बत्ती, कभी-कभी कुछ गाओ
कागज का यह कुआँ, घड़े ! शंकाएँ फिर भी रह जाएँगी
यही किताबें ! यही किताबें !! एकदिन तुमको खा जाएँगी

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